Kabir ke Dohe | संत कबीर के दोहे वो भी अर्थ सहित हिंदी में

Kabir Das
कबीर दास भारत के महान संत में एक जिन्हें हम कवी कबीर दास के नाम से भी जानते है। इनका जन्म 1440 में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि उनका संबंध हिन्दू ब्राह्मण परिवार से था लेकिन वे बिन बच्चों के मुस्लिम परिवार नीरु और नीमा द्वारा अपनाये गये थे । आज हम इस पोस्ट में खास kabir ke dohe लेकर आए है। साथ ही kabir ke dohe with meaning हैं। तो आनंद लीजिये संत कबीर के दोहे वो भी अर्थ सहित .


kabir das ji ke dohe aur unke arth

कबीर प्रेम न चक्खिया,चक्खि न लिया साव।
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव॥

अर्थ – कबीर कहते है की जिस व्यक्ति ने प्रेम को चखा नहीं और चख कर स्वाद नहीं लिया वह उस अतिथि के सामान है जो सुने निर्जर घर में जैसा आता है वैसा ही चला भी जाता है कुछ प्राप्त नहीं कर पता।

कबीर दास के दोहे हिंदी में फोटो पर

झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह।
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह॥

अर्थ – बदल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे।  इससे मिटटी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा।

हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह।
सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह॥

अर्थ – पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है। सूखा काठ – लकड़ी क्या जाने की कब पानी बरसा ? भावार्थात सहृदय ही प्रेम के भाव को समझता है। निर्मम भावना को क्या जाने।

kabir ke dohe

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥

अर्थ – रात नींद में नष्ट कर दी सोते रहे, दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली यह मनुष्य जन्म हिरे सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा ? दो कौड़ी !

 

famous kabir ke dohe in hindi

कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी ।
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ।।

अर्थ – कबीर कहते है अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो ? ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो। सजग होकर प्रभु का ध्यान करो। वह दिन दूर नहीं जब तुम्हे गहन निद्रा में सो ही जाना है जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं ? प्रभु स्मरण क्यों नहीं करते।

मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।।

अर्थ – मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते है की मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बुते पर पूर्ण नहीं कर सकते यदि पानी से घी निकल आये, तो रूखी रोटी कोई न खायेगा।

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कबीर के दोहे मीठी वाणी

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।

अर्थ – हमें उस धन का संग्रह करना चाहिए जो आगे का हो, जीवन समाप्त होने पर जो काम आये, सांसारिक धन को अपने सर पर पोटली की तरह लाद कर किसी को ले जाते नहीं देखा है।

 

कबीर के दोहे इन हिंदी

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।।

अर्थ – शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है यदि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ।
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।।

अर्थ – कबीर कहते है की संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहाँ उसका मन होता है, शरीर उड़कर वही पहुँच जाता है। सच है की जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है।

kabir ke dohe in hindi

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत।
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।।

अर्थ – सज्जन को चाहे करोड़ो दुष्ट पुरुष मिले फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते है, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।

 

kabir ji ke dohe

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस।
भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस।।

अर्थ – कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते है की इन्हे कोई ऐसा पथदर्शक न मिला जो उपदेश देता और अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता।

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।।

अर्थ – कबीर कहते है की अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है ? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन समान है, जो कुछ तो उसके मुहं में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है।

kabir das ke dohe in hindi

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।।

अर्थ – इस संसार का नियम है की जो उदय हुआ है वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा।  जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।

 

कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस।
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस।।

अर्थ – कबीर कहते है की यह मानव ! तू क्या गर्व करता है ? काल अपने हाथों में तेरे केश पकडे हुए है।  मालूम नहीं , वह घर या परदेश में कहाँ पर तुझे मार डाले।

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई।
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।।

अर्थ – कबीर कहते है की जब गन को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो गन की कीमत होती है।  पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है।

kabir ke dohe with meaning

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।।

अर्थ – कबीर कहते है की समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए।  बगुला उनका भेद नहीं जानता परन्तु हंस उन्हें चुन चुन कर खा रहा है। इसका अर्थ यह है की किसी भी वस्तु का महत्व जानकर जानता है।

 

kabir das ke dohe hindi

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।।

अर्थ – कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया। कबीर कहते है की अब भी यह मन होश में नहीं आता। आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है।

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना।
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।।

अर्थ – कबीर कहते है की हिन्दू राम के भक्त है और तुर्क को रहमान प्यारा है।  इसी बात पर दोनों लड़ लड़ कर मौत के मुहं जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को जान न पाया।

 

गुरु पर कबीर के दोहे

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।।

अर्थ – इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते है की सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो।

kabir ke dohe sakhi meaning in hindi

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार।
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।।

अर्थ  – इस संसार में मनुष्य  जन्म मुश्किल से मिलता है। यह मानव शरीर उसी तरह बार बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता झाड़  जाए तो दोबारा दाल पर नहीं लगता।

 

कबीर के दोहे अर्थ सहित

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

अर्थ –  न तो अधिक बोलना अच्छा है,  जरूरत से ज्यादा चुप रहना ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।।

अर्थ – यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है की वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसीलिए वह हृदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुँह से बाहर आने देता है।

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।

अर्थ – जो प्रयत्न करते है, कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ लेकर आता है। लेकिन बिचारे लोग ऐसे भी होते है जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते है और कुछ नहीं पाते।

कबीर दास जी के दोहे अर्थ सहित

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त।
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।।

अर्थ – यह मनुष्य का स्वभाव है की जब वह दूसरों के दोष देख कर हँसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका आदि है न अंत।

 

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।

अर्थ – कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घूमता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है की हाथ की इस माला को छोड़ कर  मोतियों को बदलो या फेरों।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।।

अर्थ – मन में धीरज रखने से सबकुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा।

 

kabir das ka janm kab hua tha

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय।
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।।

अर्थ – कबीर कहते है की एक छोटे से तिनके की कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के निचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है।

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए।
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की आप कितना भी नहा धो लीजिए लेकिन मन साफ़ नहीं हुआ तो उस नहाने फायदा, जैसे मछली हमेशा पानी में रहती है लेकिन फिर भी वह साफ़ नहीं होती, मछली में तेज बदबू आती है।

संत कबीर के दोहे

जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश।
जो है जा को भावना सो ताहि के पास।।

अर्थ – कमल जल में खिलता है और चन्द्रमा आकाश में रहता है। लेकिन चंद्रमा का प्रतिबिंब जब जल में चमकता है तो कबीर दास जी कहते है की कमल और चंद्रमा में इतनी दुरी होने के बावजूद भी दोनों कितने पास है। जल में चंद्रमा का प्रतिबिंब ऐसा लगता है जैसे चन्द्रमा खुद कमल के पास आ गया हो।  वैसे ह जब कोई इंसांन ईश्वर से प्रेम करता है तो ईश्वर स्वयं चलकर उसके पास आते है।

 

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की जब मेरे अंदर अहंकार था, तब मेरे हृदय में ईश्वर का वास नहीं था और अब मेरे हृदय में ईश्वर का वास है तो अहंकार नहीं है। जब से मैंने गुरु दीपक को पाया है तब से मेरे अंदर का अहंकार ख़त्म हो गया है।

आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत।
अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गयी खेत॥

अर्थ – कबीर दास जी कहते हैं की बिता समय निकल गया, अपने ना ही कोई परोपकार किया और ना ही ईश्वर का ध्यान किया।  अब पछताने से क्या होता है, जब चिड़िया चुग गयी खेत।

जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप।
जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की जहाँ दया है वही धर्म है और जहाँ लोभ है वहां पाप है, और जहाँ क्रोध है वहां सर्वनाश है और जहाँ क्षमा है वहा ईश्वर का वास होता है।

कबीर के दोहे अर्थ सहित

पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात।
देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की इंसान की इच्छाएं एक पानी के बुलबुले के समान है जो पल भर में बनती हैं और पल भर में ख़त्म जिस दिन आपको सच्चे गुरु  दर्शन होंगे उस दिन यह मोहमाया और अंधकार छिप जाएगा।

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की एक सज्जन पुरुष में सुप जैसा गन होना चाहिए। जैसे सुप में अनाज के दानों को अलग कर दिया जाता है वैसे ही सज्जन पुरुष को अनावश्यक चीज़ों को छोड़कर केवल  अच्छी बातें ही ग्रहण करनी चाहिए।

कबीर दास के दोहे अर्थ सहित

निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए।।

अर्थ – जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है।

 

short poems of kabir das in hindi

जाती न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।।

अर्थ – सज्जन की जाती न पूछकर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न की उसकी मयान का।

मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।
तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मोर॥

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की मेरे साईं, मुझमे मेरा तो कुछ भी नहीं जो कुछ भी है, वह सब तेरा ही। तब तेरी ही वस्तु तुझे सौंपते मेरा क्या लगता है, क्या आपत्ति हो सकती है मुझे।

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय।।

अर्थ – दुःख में हर इंसान ईश्वर को करता है लेकिन सुख में सब ईश्वर को भूल जाते हैं। अगर सुख में भी ईश्वर को याद करो तो दुःख कभी आएगा ही नहीं

 

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की लोग बड़ी से बड़ी पढाई करते है लेकिन कोई पढ़कर पंडित या विद्वान् नहीं बन पाता। जो इंसान प्रेम का ढाई अक्षर पढ़ लेता है वही सबसे विद्वान् है।

कबीर के दोहे का भावार्थ

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की मायाधन और इंसान का मन कभी नहीं मरा इंसान मरता है शरीर बदलता है लेकिन इंसान की इच्छा और ईर्ष्या कभी नहीं मरती।

 

kabir das ke bhajan hindi

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की हमारे पास समय बहुत कम है, जो काम कल करना है वो आज करो, और जो आज करना है वो अभी करो, क्यूंकि पलभर में प्रलय हो जायेगी फिर आप अपने काम कब करेंगे। 

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।।

अर्थ – जब कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को रौंद रहा था, तो मिटटी कुम्हार से कहती है ” तू मुझे रौंद रहा है, एक दिन ऐसा आएगा जब तू इसी मिटटी में विलीन हो जाएगा और में तुझे रौंदूंगी। “

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की मैं सारा जीवन दूसरों की बुराइयां देखने में लगा रहा लेकिन जब मैंने खुद अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया की मुझसे बुरा कोई इंसान नहीं है।  मैं ही सबसे स्वार्थी और बुरा हूँ भावार्थःत हम लोग दूसरों की बुराइयां बहुत देखते है लेकिन अगर आप खुद के अंदर झांक कर देखें तो पाएंगे की हमसे बुरा की इंसान नहीं है। 

aisi vani boliye kabir ke dohe

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की इंसान को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सूसने वाले के मन को बहुत अच्छी लगे।  ऐसी भाषा दुसरे लोगो को तो  पहुंचाती है इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है। 

 

kabir das ka janm

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।

अर्थ – कबीर दास जी कहते है की खजूर का पेड़ बेशक बहुत बड़ा होता  लेकिन ना तो वो किसी को चाय देता है और फल भी बहुत दूर ऊंचाई पर लगता है। इसी तरह आप किसी का भला नहीं कर पा रहे तो ऐसे बड़े होने से भी कोई फायदा नहीं है। 

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥

अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते है की अगर हमारे सामने गुरु और भगवन दोनों एक साथ खड़े हो तो आप किसके चरण स्पर्श करेंगे? गुरु ने अपने ज्ञान से ही भगवान से मिलने का रास्ता बताया है इसीलिए गुरु की महिमा भगवन से भी ऊपर है और हमें गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए।

 

class 10 hindi kabir ke dohe explanation

अंधो का हाथी सही, हाथ टटोल-टटोल ।
आंखो से नहीं देखिया, ताते विन-विन बोल ।।

अर्थ – वस्तुत यह अंधों का हाथी है जो अँधेरे में अपने हाथों से टटोल कर उसे देख रहा है।  वह अपने आँखों से उसे नहीं देख रहा है और उनके बारे में अलग अलग बाते कह रहा है। अज्ञानी लोग ईश्वर का सम्पूर्ण वर्णन करने में समझ नहीं है।

 

kabir das images

वचन वेद अनुभव युगति आनन्द की परछाहि ।
बोध रुप पुरुष अखंडित, कहबै मैं कुछ नाहि ।।

अर्थ – वेदों के वचन, अनुभव, युक्तियाँ आदि परमात्मा के प्राप्ति के आनंद की परछाई मात्र है। ज्ञान स्वरूप एकात्म आदि पुरुष परमात्मा के बारे में मैं कुछ भी नहीं बताने के लायक हूँ।

ज्ञानी भुलै ज्ञान कथि निकट रहा निज रुप ।
बाहिर खोजय बापुरै, भीतर वस्तु अनूप ।।

अर्थ – तथाकथित ज्ञानी अपना ज्ञान बघारता है जबकि प्रभु अपने स्वरूप में अत्यंत निकट ही रहते है। वह प्रभु को बाहार खोजता है जबकि वह अनुपम आकर्षक प्रभु हृदय के विराजमान है।

 

famous kabir ke dohe in hindi

ज्यों गूंगा के सैन को, गूंगा ही पहिचान ।
त्यों ज्ञानी के सुख को, ज्ञानी हबै सो जान ।।

अर्थ – गूँगे लोगो के इशारे को एक गूंगा ही समझ सकता है। इसी तरह एक एटीएम ज्ञानी के आनंद को एक आत्म ज्ञानी ही जान सकता है।

 

kabir ke dohe

ज्ञानी मूल गंवायीयाॅ आप भये करता ।
ताते संसारी भला, सदा रहत डरता ।।

अर्थ – किताबी ज्ञान वाला व्यक्ति परमात्मा के मूल स्वरूप को नहीं जान पता है। वह ज्ञान के दंभ में स्वयं को ही कर्ता भगवान समझने लगता है। उससे तो एक सांसारिक व्यक्ति अच्छा है जो कम से कम भगवान से डरता तो है।

अंधे मिलि हाथी छुवा, अपने अपने ज्ञान ।
अपनी अपनी सब कहै, किस को दीजय कान ।।

अर्थ – अनेक अंधो ने हाथी को छू कर देखा और होने अपने अनुभव का बखान किया। सब अपनी अपनी बातें कहने लगे अब किसकी बात का विश्वास किया जाए।

आतम अनुभव ज्ञान की, जो कोई पुछै बात ।
सो गूंगा गुड़ खाये के, कहे कौन मुुख स्वाद ।।

अर्थ – परमात्मा के ज्ञान का आत्मा में अनुभव  अनुभव के बारे में यदी कोई पूछता है तो इसे बतलाना कठिन है। एक गंगा आदमी गुड़ खांड़सारी खाने के बात उसके स्वाद को कैसे बता सकता है।

kabir ke dohe gyani to nirbhar 

ज्ञानी तो निर्भय भया, मानै नहीं संक ।
इन्द्रिन केरे बसि परा, भुगते नरक निशंक ।।

अर्थ – ज्ञानी हमेशा निर्भय रहता है। कारन उसके मन में प्रभु के लिए कोई शंका नहीं होता। लेकिन यदि वह इन्द्रियों के वश में पड़ कर विषय भोग में पर जाता है तो उसे निश्चय ही नरक भोगना पड़ता है।

आतम अनुभव जब भयो, तब नहि हर्श विशाद ।
चितरा दीप सम ह्बै रहै, तजि करि बाद-विवाद ।।

अर्थ – जब हृदय में परमात्मा की अनुभूति होती है तो सारे सुख दुःख का भेद मिट जाता है। वह किसी चित्र के दीपक की लौ की तरह स्थिर हो जाती है और उसके सारे मतान्तर समाप्त हो जाते है।

भीतर तो भेदा नहीं, बाहिर कथै अनेक ।
जो पाई भीतर लखि परै, भीतर बाहर एक ।।

अर्थ – हृदय में परमात्मा एक हैलेकिन बाहर लोग अनेक कहते है। यदि हृदय के अंदर परमात्मा का दर्शन को जाए तो वे बाहर भीतर सब जगह एक ही हो जाते है।

भरा होये तो रीतै, रीता होये भराय ।
रीता भरा ना पाइये, अनुभव सोयी कहाय ।।

अर्थ – एक धनी निर्धन और निर्धन धनी हो सकता है। परंतु परमात्मा का निवास होने पर वह कभी पूर्ण भरा या खाली नहीं रहता। अनुभव यही कहता है। परमात्मा से पूर्ण हृदय कभी खाली नहीं हमेशा पूर्ण ही रहता है।

बूझ सरीखी बात हैं, कहा सरीखी नाहि ।
जेते ज्ञानी देखिये, तेते संसै माहि ।।

अर्थ –  परमात्मा की बाते समझने की चीज़ है। यह कहने के लायक नहीं है। जितने बुद्धिमान ज्ञानी है वे सभी अत्यंत भ्रम में है।

Shayari Photo collection – Pintrest

kabir ke dohe for students

लिखा लिखि की है नाहि, देखा देखी बात ।
दुलहा दुलहिन मिलि गये, फीकी परी बरात ।।

अर्थ – परमात्मा के अनुभव की बाते लिखने से नहीं चलेगा। यह देखने और अनुभव करने की बात है। जब दूल्हा और दुल्हन मिल गए तो बारात में कोई आकर्षण नहीं रह जाता है।

निरजानी सो कहिये का, कहत कबीर लजाय ।
अंधे आगे नाचते, कला अकारथ जाये ।।

अर्थ – अज्ञानी नासमझ से क्या कहा जाए। कबीर जी को कहते लाज लग रही है। अंधे के सामने नाच दिखाने से उसकी कला भी व्यर्थ हो जाती है।  अज्ञानी के समक्ष आत्मा परमात्मा की बात करना व्यर्थ है।

ज्ञानी युक्ति सुनाईया, को सुनि करै विचार ।
सूरदास की स्त्री, का पर करै सिंगार ।।

अर्थ – एक ज्ञानी व्यक्ति जो परामर्श तरीका बतावें उस पर सुन कर विचार करना चाहिए। परन्तु एक अंधे व्यक्ति की पत्नी किस के लिए सज धज कर श्रृंगार करेगी।

ताको लक्षण को कहै, जाको अनुभव ज्ञान ।
साध असाध ना देखिये, क्यों करि करुन बखान ।।

अर्थ – जिसे अनुभव का ज्ञान है उसके लक्षणों के बारे में क्या कहा जाए। वह साधु असाधु में भेद नहीं देखता है। वह समदर्शी होता है। अत उसका वर्णन क्या किया जाय।

दूजा हैं तो बोलिये, दूजा झगड़ा सोहि
दो अंधों के नाच मे, का पै काको मोहि।

अर्थ – यदि परमात्मा अलग अलग हो तो कुछ कहा जाए। यहीं तो सभी झगड़ों की जड़ है। दो अंधो के नाच में कौन अँधा किस अंस अंधे पर मुग्ध और प्रसन्न होगा।

नर नारी के सूख को, खांसि नहि पहिचान ।
त्यों ज्ञानि के सूख को, अज्ञानी नहि जान ।।

अर्थ – स्त्री पुरूष के मिलन को नपुंसक नहीं समझ सकता। इसी तरह ज्ञानी का सुख एक मुर्ख अज्ञानी नहीं  है।

 

kabir ke dohe hindi mein arth sahit

कहा सिखापना देत हो, समुझि देख मन माहि ।
सबै हरफ है द्वात मह, द्वात ना हरफन माहि ।।

अर्थ –  शिक्षा देता रहूं। स्वयं अपने मन में समझो। सभी अक्षर दावात में है पर दावात अक्षर में नहीं है।  यह संसार परमात्मा में स्थिर है पर परमात्मा इस सृष्टि से भी बहार तक असीम है।

ज्ञान भक्ति वैराग्य सुख पीव ब्रह्म लौ ध़ाये ।
आतम अनुभव सेज सुख, तहन ना दूजा जाये ।।

अर्थ – ज्ञान, भक्ति, वैराग्य का सुख जल्दी से तेज गति से भगवन तक पहुँचता है। पर आत्मानुभव आत्मा और परमात्मा का मेल कराता है।  जहाँ अन्य कोई प्रवेश नहीं कर सकता।

कागत लिखै सो कागदी, को व्यहाारि जीव ।
आतम द्रिष्टि कहां लिखै, जित देखो तित पीव ।।

अर्थ – कागज़ में शास्त्रों की बात महज दस्ताऐवज है।  वह जीव का व्यावहारिक अनुभव नहीं है। आत्मा दृष्टी  प्राप्त व्यक्तिगत्त अनुभव कही लिखा नहीं रहता हैं हम जो देखते है अपने प्यारे परमात्मा को पाते है।

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